सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

ज्यादा सोचते कम विचारते हुए

अंधेरा ही अंधेरा दिखता है। किसी पेशाबघर में खड़ा होकर लड़ रहा हूँ अपने आसपास निवृत्त होकर जाने वाले हर उस आदमी से जो फल्स नहीं दबा रहा है। आज शायद चौथा दिन है। और जाने कौन से नम्बर का सपना है यह जो अभी अभी आपने पढ़ा। इससे पहले मैं अलग अलग सपनों में भी हकारता हुआ चिल्ला ही रहा था किसी को, कहीं गहरी अंधेरी गुफा में फसा हुआ हूँ और आगे निकलने का जतन कर रहा हूँ कुछ जानवर भी मेरे साथ फसे हैं, उनमें एक छोटा पिल्ला है, जो मेरे बचपन में घर पर था, तब मैं 6 वर्ष का रहा होउँगा, अंशुमान भईया उसे साइकिल पर पीछे बिठाकर ले जा रहे थे बाग की तरफ से और उसका पाँव चक्के में फंसकर टूट गया था, बड़े पापा ने उसको प्लास्टर करके बांस की फट्टी से जोड़ दिया था। वो फिर चलने दौड़ने लगा था। बहुत सुंदर था वो। वो उसकी टूटे पैर के साथ मेरे पास खड़ा है मेरा पैंट खींच रहा है और कुं कूँ कर रहा है, मैं इरिटेट होकर चिल्ला रहा हूँ जैसे सब मनुष्य हैं जो मेरी बात समझ लेंगे। शायद इसे ही बुखार सिर पर चढ़ना कहते होंगे। तो क्या श्रीकांत वर्मा को भी बुखार सिर पर चढ़ गया था ? ऐसी कविता पागलपन में ही लिखी जा सकती है।  दो दिन तो...

जिनमें आवाज़ नहीं है

◆ जिनमें आवाज नहीं है उस दिन मैं देर तक सोचता रहा था। आपने गहरे तक प्रभावित किया। इनकी बात से फलां चीज़ को फलां दृष्टिकोण मिला। हम देखते हैं। मेरा भी मन था पर नहीं कर पाया / पायी ।  समय नहीं मिल पाया। समय कम था। जलन। वो उन लोगों के आसपास रहता है वैसा है नहीं। पता नहीं क्या हो गया है। मित्रों। भाइयों बहनों। दोस्त। आपके अलावा कोई नहीं। देशभक्ति। साधु। महाराज।  मुझसे नहीं हो पा रहा है। अन्तोगत्वा। अन्ततः। ऐसे और कुछ शब्द युग्म जिनसे मैं अब भली भांति परिचित हो चुका हूं अब मैं इनके जाल में नहीं फँसता, जहाँ भी यह उपयोग किए जाते हैं मैं समझ जाता हूँ यहां कुछ तो दिक्कत है। विशेषण, अपवाद, और अति शांत तीनों से हमेशा सावधान रहना चाहिए।  ***********  गुटों, प्रोफेसरों, नेताओं, अफसरों, विभागों, किताबों,  जातियों, धर्मों, के बीच मनुष्य मर गया, हम सब जिसे देख रहें हैं, हाथ मिला रहें हैं, मुस्कुरा रहें हैं, सब किसी न किसी गुट के हैं, किसी न किसी जाति के हैं, किसी न किसी धर्म के हैं, स्वतंत्र कोई नहीं हैं, शोषकों का विरोध करते करते यह सब खुद शोषक बन गए हैं। इन सब से उ...

वह जो करता रहा दिनभर

इधर कुछ दिनों से सुबह सुबह की तरह होती है, रात जल्दी आँख बन्द कर लेने का प्रयास करता हूँ, जो जो बन पड़ता है वो जतन करता हूँ कि सो जाए, और सो जाता हूँ। अपने और अपनों दोनों को रूटीन में लाने का प्रयास कर रहा हूँ। रात देर तक कुछ संवादों पर मन मस्तिष्क चल रहा था कुछ घटनाओं पर भी..  मन टूट जाता है कई बार जब बहुत करीबी व्यक्ति दो आँख करते दिखता है। कई बार संवाद से भी वह नहीं समझाया जा सकता है जो सच सच कहना चाहते हैं, कहे को अलग ढंग से इन्टरप्रेट कर लिया जाता है और वो तमाम बात बेअर्थ और बेमानी हो औसत बनकर रह जाती हैं जिनका अर्थ हो सकता था.. ख़ैर कवि कह गया है कि आदमी की नियति है न समझे जाना, यहाँ आदमी जेंडर विशेष के लिए नहीं, सम्पूर्ण मनुष्य जाति के लिए है।  रोता हूँ और रोते हुए सोचता हूँ अब नहीं रोऊंगा। अब छिपकर रोता हूँ, पहले उसके सामने भी रो पड़ता था।  दिन भर में कुछ विशेष किया नहीं, एक काम जिम्मे लिया है, धन के लालच वश उसका एक अध्याय आज पूरा हुआ। मैं कभी कभी सोचता हूँ जिस दिन दिमाग ठीक ठीक काम कर देता है उस दिन मैं दिन भर में कई पन्ने पढ़ लिख दोनों लेता हूँ , जिस दिन...

भागने से बचते हुए और और भागता हूँ

दिन भर ऊबते ऊँघते गुस्से से अपना ही होंठ खाते बीत गया। कभी कभी मुझे चिढ़ होती है, और वह क्यूँ शुरू होती है पता नहीं कर पाता। कोई विशेष और बड़ी वजह नहीं होती कोई छोटी मूर्खता बहुत होती है चिढ़ के लिए। कभी कभी तो मुझे इस बात पर क्रोध फूट पड़ता है कि कोई फूल क्यूँ तोड़ता है। कल ऐसा ही हुआ था। ऐसा क्रोध अपने भीतर मैंने कई साल पहले महसूस किया था, हैपी ( चचेरे भाई) तब छोटे थे, वो मेरे आस पास साइकिल दौड़ा रहे थे। मैं थका हारा स्कूल से आया था और गाय के चारे पानी के प्रबंध में लग गया था, भूख और थकन की वजह से मन पहले ही जल रहा था, उस बीच उसकी शैतानी और बार बार मेरे कहने के बावजूद न रुकने की वजह से मुझे ऐसा क्रोध आया था कि मैं खड़े खड़े काँप रहा था और उसी क्रोध में मैंने उसे इतना कसकर थप्पड़ मारा था कि साइकिल से गिर पड़ा।  क्रोध शांत हुआ तो दिनों तक पछतावा रहा। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था, मैं मना कर रहा था कि फूल मत छुओ वो उसे मसल गए, मैं इतना क्रोध में था कि अगर वो मित्र न होते तो मेरी अंगुलियां उनके गाल पर छपी होतीं, उस क्रोध के बाद मुझे बहुत सी घटनाएं याद हो आईं, बहुत से दिन याद आए, अप...

कई दिनों की कुछ कुछ बातें

◆ ढेरों अनुभवों से कुछ कुछ बातें जीवन की विसंगति यह है कि विसंगत दिनों में ही हमें सबसे ज्यादा इच्छाएं घेरती हैं, मन हज़ार राह पर चलना चाहता है यह जानते हुए भी कि पाँव सिर्फ दो हैं, हम बहुत कुछ कर लेने की इच्छा से इतना भरे होते हैं कि कुछ भी करते हैं और अपनी ऊर्जा को खपाते हैं। ऐसा क्यूँ है कि जब देह ऊर्जा से भरी होती है तो बुद्धि काम नहीं करती और जब बुद्धि काम करती है तो देह शिथिल हो चुकी होती है।  जाने क्या क्या कर रहा हूँ पता नहीं, बहुत कुछ इसीलिए कर रहा हूँ कि भीतर कुछ न करने के अपराधबोध को कम रख सकूँ। कल शाम पिताजी से बात हुई देर तक बात हुई वो कुछ भावुक किस्म की बातें कर रहें थे। सब ऐसा कहते हैं कि वह ऐसी बातें करते नहीं, पर जाने क्यूँ उन्होंने मुझसे हर तरह की बातें जी हैं, जिसका हमारे ही घर के और लोगों को शायद मेरे बताने पर भरोसा नहीं हो, पिताओं की छवि ऐसी क्यूँ होती है कि वो हमेशा पहाड़ की तरह देखे जाते हैं। मेरे पिता नदी हैं, बालू के नीचे से बहती नदी। उनका स्वास्थ्य थोड़ा खराब है इधर तीन दिनों से मौसमी जुकाम है। इस घर और उस घर हर जगह हाल यही है। कोई गाँठ और कमर दर्द से परेशान ...

अ-लक्षित सा कुछ

◆ जमा-दारी विस्मय, ऊब, खुशी, उदासी, थकन, अ-सम्भव, अर्वाचीन, आत्मीय, साथ, स्पर्श, भरोसा, आँख, पाँव, बारिश, महादेव, गंगा, अनादि, भीड़, हॉर्न, लूटपाट, पान, काशी, नागरी प्रचारिणी सभा, भव्य, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बनारसी दास, साजन मिश्र, सुमन केशरी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, हरिवंश, पूर्वायन चटर्जी,  बद्री नारायण, पंडित कुमार बोस, व्योमेश शुक्ल,  आदि आदि,  सुख, अनुभूति, निश्चिंतता, सगाई, परिवार, नेपथ्य, घबराहट, वापसी, गायब.. कुल यही सब है जीवन में इन दिनों। जिसे विस्तार देने का मन नहीं है। बस इतना कहा जा सकता है कि बहुत कुछ बस स्वीकार करना चाहिए कहना नहीं।  कुछ कुछ शब्द लिखना था पर लिखा एक पूरा वाक्य। कुछ कुछ शब्द में क्या हमेशा कुछ कुछ छूट जाता है ? या हम बस कुछ कुछ ही कह पाते हैं ? इसका ठीक उत्तर क्या है ? हमारे आसपास कहीं भी अल्प, उप, और अर्द्धविराम नहीं है। हम प्रश्नवाचक चिन्ह और पूर्णविराम के बीच घूम रहें हैं। कभी कभी विस्मयादिबोधक चिन्ह से भिड़ंत हो जाती है। और हम वहां भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा देते हैं। हम पूर्णविराम और प्रश्नवाचक चिन्ह एक...

कह देने भर के लिए न कहते हुए..

इन दिनों सब कुछ उन दिनों से बिल्कुल अलग है जिन दिनों हम इन दिनों के विषय में सोचते हुए कहते थे साधन जीवन आसान करेंगे। साधन ने जीवन मुश्किल किया, छिपने के और रास्ते दिए, चोरी के कई कई तरीके, मारने के अनगिन हथियार ऐसे हथियार जो पैने नहीं होते, जो काटते नहीं कुचलते हैं या पीस देते हैं। धोखे बाजी के विकल्प ही विकल्प हैं। इन दिनों कुछ भी गम्भीर नहीं, यह सबसे गम्भीर विषय है।  इन दिनों संवेदनशील शब्द सबसे अधिक असंवेदनशील लोग उपयोग करते हैं। इन दिनों भाषा फूल की पंखुड़ी की तरह नहीं भाले की नोक की तरह चूभते हैं। इन दिनों सबसे कु-कर्मी वही हैं जिन्होंने सुकर्म के पाठ लिखे।  इन्हीं दिनों मैं हर रोज सोचता हूँ शब्दों का साथ छोड़ दूं, और हर रोज कुछ ऐसा घटता है कि शब्द स्वतः झरने लगते हैं मुझसे जैसे जबरन झिंझोड़ने से गिरते हैं पेड़ से कचे पके सारे फल  मैं धीरे धीरे द्वंदों को सुलझा रहा हूँ और उन प्रश्नों के उत्तर की तरफ जा रहा हूँ जो मैं लगभग 20 दिनों से तलाश रहा था। सच बेहद सीधा होता है, चुप्पी या एक भी अतिरिक्त शब्द से सच झूठ हो जाता है। हमें सबसे नहीं बस उस एक व्यक्ति से सच क...