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संदेश

कोई कहीं से पुकारे मुझे

मुझे न जाने क्यूँ किस बात पर क्रोध आ जाता है मैं जान ही नहीं पाता। यह सुनने में कितना अजीब है मगर सच है। सच बताऊं तो मैं समझ नहीं पाता मैं क्रोध में होता हूँ या दुःख में. पर यह अचानक होता है मैं अपने को बेकार से महसूस करता हूँ। क्यूँ ? पता नहीं ।  ********** परिवार में सब खुशहाल हैं, जो जहाँ हैं अपने ढंग से संक्रांति मना रहें हैं, कोई सरयू में नहा रहा है कोई नर्मदा में तो कोई कई नदियों में एक साथ, सबके चेहरों पर प्रसन्नता है। मन उल्लास से भरा है।  कोई चूड़ा दही खा रहा है कोई उड़द की खिचड़ी, मैं हर जगह थोड़ा थोड़ा हूँ और कहीं नहीं हूँ। त्योहार बड़े जरूरी हैं रुचियाँ स्पष्ट होती हैं, मन खुलता है।  ********* कहीं होते हुए कहीं और होने की इच्छा हमें कहीं का नहीं रहने देती।  ********* हम कुछ लोगों के सपने में आते हैं, और कुछ लोगों का कोई सपना हमारे बिना पूरा नहीं होता, जीवन में ऐसे लोगों के पास रहिए जिनके सपने आपके बिना पूरे न होते हों।  ********* मैं कुछ दिनों के लिए पहाड़ पर रहना चाहता हूँ, यहाँ की सभी सुख सुविधाओं को छोड़कर दो जोड़ी धोती पेटभरने भर के अनाज, कुछ...

जीवन राह

हम सब उम्मीद से ज्यादा किसी टीस के सहारे ज़िंदा हैं। टीस शायद ठीक शब्द होगा, अगर हम इसे खीझ कहें तो कोई ग़लत नहीं होगा। हॉं खीझ..खीझ ही हमें बचाए हुए है। समय से कुछ न हो पाने की खीझ, किसी से दूर रहने की खीझ, मन का जीवन न जी पाने की खीझ में हम जीवन को रगड़ा देकर जी रहें हैं। हम जीवन में जो कुछ तनिक  या हल्के मार्जिन से चूक गए उसके लिए जीवन से भारी शुल्क उसूल रहें हैं। हमारी जीवन शैली ऐसी है कि जीवन भी अब जीवन रूप में आने से डरने लगा है।  कल की रात नींद नहीं आ रही थी, कुछ घड़ी फोन  देखता रहा, कुछ घड़ी दीवार और पंखे की गंदी पत्ती। कुछ पुरानी तस्वीरों और वॉइस नोट्स से उन दिनों में लौटा, जिन दिनों को सोच लेने पर अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं होता.. छाया मत छुना मत का एक पुराना रिकॉर्ड सुना, अखरावट के कुछ पद पढ़े। सुबह को नींद आई। नींद लाने के लिए बड़े जतन करने पड़ते हैं। अजीब है, जागने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। दिन कई करवटों में बीता। सम्भवतः रात भी ऐसे ही बीते। हम कभी कभी बीते दिनों की गंदगी साफ करने में आने वाले दिन को बर्बाद कर लेते हैं।  इन दिनों घूम फिर कर राजन जी म...

शाम ढले डरने लगता है दिल कोई छोटा बच्चा है

मन लगातार बस एक तरह का रहता है। भीतर यह चाह बनी रहती है कि कैसे करके वहाँ पहुँच जाऊँ जहाँ आसपास सब कुछ अपना सा है। संयुक्त परिवार भी रहा तो बहुत शालीनता और ज्यादा खामोशी कम वाचालता के साथ रहा। हम बचपन से जैसे जैसे बड़े हुए लोग अपनी रोजी रोटी के लिए जहाँ गए वहीं बसते गए। बाबा की मृत्यु हुई, परिवार पूर्णतया बिखरता गया। यही मौसम था यही समय मैं भूल नहीं रहा हूँ तो यही तारीख़ भी, हमको वो दिन एक एक पल याद है। हम सब जब श्मशान से लौटे तो ननिहाल से खाना आया था, हम सब भाई बहनों ने वही खाया था। पिताजी लोग तो वैसे ही रहे थे। अगले दिन क्रिया शुरू होने के पश्चात शाम को कुछ खाया था शायद आलू या गंजी उबाली गयी थी। सन 2009 की बात है, मकर संक्रांति पड़ी थी अगले दिन.. महीने दो महीने लोगों का आवागमन रहा फिर घर पर कुल 5 लोग बचे, मैं दोनों बहनें माँ और दादी... हम सब में कोई बहुत बोलने वाला नहीं है। सब अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त, बात होती भी तो लो टोन में वो आवाज़ कान को दुःख देने वाली नहीं होती थी। परिवार में बचपन से बहुत संस्कारित माहौल था। 5 बजे सुबह उठना, सबके पैर छुना, वंदना करना, खेत जाकर काम करना, फिर स...

कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

अलग अलग जीवों के लिए आक्सीजन भी अलग अलग ही होता है यह मैं धीरे धीरे महसूस कर पाया, बेहतर तरीके से तब जान पाया जब उसके छू लेने भर से अपने भीतर की उदासी को बिलाते देखा, एक कमरे को भरे पूरे घर की तरह महसूस किया। प्रेमी के लिए उसकी प्रेमिका की उपस्थिति ही प्राणवायु होती है क्या है कहना अनुचित है ? ******** नींद फिर वैसी ही आँख मिचौली करने लगी है। रात सपनों से भरी रहती है, कैसे सपने ? यह बेहद निजी बात है, इसे केवल वही जान सकती है।  सुबह से दो अजीबोगरीब घटनाएं हुईं। व्हाट्सएप पर एक अंजान नम्बर से लगातार 4 बार कॉल आया, फोन मुझसे यूँ भी एक बार मे उठता नहीं, सो उठाया नहीं, घण्टे भर बाद मन हुआ कि देखूँ वह अन्जान नम्बर किसका है तो प्रोफ़ाइल पर एक खाकी वर्दी पहने अधेड़ उम्र व्यक्ति की तस्वीर लगी थी, मुझे ढेरों मैसेज भेजे थे, जिसमें मैं किसी से वासना भरी बात कर रहा हूँ ऐसा कुछ मामला था, नीचे एक धमकी भी थी, आपको 2 दिन में हेरासमेन्ट के केस में गिरफ्तार करना है, फोन कीजिए.. मैं देर तक देखता रहा सोचता रहा ऐसी बात तो मैं अपनी प्रेमिका से कभी बहुत निजी क्षण में भी नहीं कहता, न कह पाउँगा। अ...

मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर

कभी कभी मन में यह भाव क्यूँ आता है कि चलो हम कुछ दिन वह सब छोड़कर देखते हैं, वह सब जो हम निरंतर करते हैं अपने आसपास के लोगों के लिए। हम पहल करना रोकते हैं, हम संवाद रोकते हैं, हम हमेशा खड़े रहने की प्रवृत्ति को रोकते हैं, हाल चाल लेते रहने की आदत को रोकते हैं, रोकते हैं कि हमारे रोकने के बाद कौन हमसे पूछता है कौन पहले पहल करता है कौन उस समय पर आकर कहता है 'अरे आप नहीं आए तो हम चले आए'  क्यूँ आता है यह विचार ? जबकि यह तय है कि पलटकर कोई नहीं करने वाला पहल, सबकी अपनी व्यस्तता है, सबकी अपनी प्राथमिकता आप हँस कर कह देंगे तो जवाब भी आप पर ही लादकर दिया जाएगा। कारण क्या है इसका ? ऐसे सम्बन्धों का अर्थ क्या है ? सच में जानना यह चाहता हूँ ऐसे लोगों पर भावनाओं को ख़र्चने का क्या अर्थ ?   जब दो जीवन के बीच वैसा चुम्बकत्व न हो जैसे होना चाहिए तो अपने जीवन को दूसरे जीवन से किनारे कर लेना ही उचित होता है। एकतरफा एफर्ट करता व्यक्ति हमेशा हृदयाघात से मरता है। यह सामान्यीकरण नहीं है, बस विचार है जिसे लक्षणा में समझने की जरूरत है।  ************ दिन ब दिन लिखे जा रहे साहित्यि...

दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए

चुप होने से पहले हम बहुत बोल रहे होते हैं। हम अचानक से चुप नहीं होते हैं, एक प्रक्रिया के तहत धीरे धीरे किस्तों में चुप होते हैं। कभी अनसुना किए जाने से, कभी अपने बोले को बेअसर होते देखने से और कभी कभी अपने बौद्धिक दबाव से.. यह सब बहुत मध्यम गति से होता है, जब तक हमें आभास होता है तब तक वह हमारी पहचान बन चुका होता है। हम गढ़े जाते हैं किसी और के मन और बुद्धि के साँचे अनुरूप, हमें चुनने की आज़ादी नहीं होती, हमारे लिए जो चुना जाता है उसे ही हमारी आज़ादी कहकर हमें पकड़ा दिया जाता है। हम किसी को मन भर गले नहीं लगा सकते, उसे चूम नहीं सकते क्योंकि हमें वह सुचिता से जोड़कर बताया गया, जबकि हम बने ही दो देहों के मिलन से हैं। हमें बहुत सामान्य सामान्य सी बातों को भी इतना आदर्शीकरण करके बताया जाता है कि जब हमें ऐसा कुछ जीने को मिलता है तो हम अपने दिल और दिमाग के द्वंद्व से ही थक जाते हैं और उसे धकिया देते हैं जिसे समेट लेना चाहिए था। दर'असल यह परवरिश की खामी है। हमें जिन्हें खोलकर रखना चाहिए हम उसे ढंककर रखते हैं जो खुला रखना था वह ढंककर। कह देने पर यह बात स्वीकार नहीं की जाती है। जैसे मैं नहीं स्...