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अ-लक्षित सा कुछ

◆ जमा-दारी

विस्मय, ऊब, खुशी, उदासी, थकन, अ-सम्भव, अर्वाचीन, आत्मीय, साथ, स्पर्श, भरोसा, आँख, पाँव, बारिश, महादेव, गंगा, अनादि, भीड़, हॉर्न, लूटपाट, पान, काशी, नागरी प्रचारिणी सभा, भव्य, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बनारसी दास, साजन मिश्र, सुमन केशरी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, हरिवंश, पूर्वायन चटर्जी,  बद्री नारायण, पंडित कुमार बोस, व्योमेश शुक्ल,  आदि आदि,  सुख, अनुभूति, निश्चिंतता, सगाई, परिवार, नेपथ्य, घबराहट, वापसी, गायब..
कुल यही सब है जीवन में इन दिनों। जिसे विस्तार देने का मन नहीं है। बस इतना कहा जा सकता है कि बहुत कुछ बस स्वीकार करना चाहिए कहना नहीं। 

कुछ कुछ शब्द लिखना था पर लिखा एक पूरा वाक्य। कुछ कुछ शब्द में क्या हमेशा कुछ कुछ छूट जाता है ? या हम बस कुछ कुछ ही कह पाते हैं ? इसका ठीक उत्तर क्या है ?

हमारे आसपास कहीं भी अल्प, उप, और अर्द्धविराम नहीं है। हम प्रश्नवाचक चिन्ह और पूर्णविराम के बीच घूम रहें हैं। कभी कभी विस्मयादिबोधक चिन्ह से भिड़ंत हो जाती है। और हम वहां भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा देते हैं। हम पूर्णविराम और प्रश्नवाचक चिन्ह एक साथ क्यूँ नहीं उपयोग कर सकते ? ऐसे ही मेरे मन में एक सवाल यह भी आया था कि हम तिवारी में 'री' की जगह 'ऋ'  क्यूँ नहीं लिख सकते ? इससे ध्वनि में तो कोई विशेष अंतर नहीं आता।  

मैं वासना ( केवल काम नहीं ) शून्य मनुष्य का चेहरा देखना चाहता हूँ, क्या वासना नहीं होने की चाह भी वासना नहीं है ? 

पढ़ रहा हूँ―  भारत भूषण अग्रवाल, असंगघोष, मलयज का पत्र, सब कुछ थोड़ा थोड़ा है। 

जैसे मैं बार बार उन्हीं शब्दों से अलग अलग बात कहता हूँ वैसे मेरी आत्मा उन्हीं उन्हीं घटनाओं से अलग अलग बात कहती है, मुझे चुप कराती है। लेकिन मैं बोलता हूँ.. वो तेज से कहती है चुप.. होंठ पर उंगली रखकर कहती है चुप रहो, मैं कुछ घड़ी चुप रहता हूँ, फिर बोलना शुरू करता हूँ। कभी उसने कहा था.. तुम बस बोलते रहो, मुझे सुनना पसंद है। अब जो आपको पसंद है उसकी पसंद के लिए आत्मसम्मान गिरवी रख देने में क्या हर्ज है, रख देता हूँ। दरअसल फेंक देता हूँ। प्रेमी को आभारी और विन्रम इतना तो होना चाहिए कि वह किसी चीज़ को अपमान की तरह न ले, लेगा तो सम्बंध से हाथ धो देगा। और इन दिनों हाथ धोना भी अच्छा जुमला नहीं है। 

19 जुलाई 2025 / रात 1:40  

#डायरी नागरीप्रचारिणी सभा

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