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लौटने की संभावना शून्य है मेरी यात्रा में..

मै नहीं कह पा रहा अबकी लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा, मै कह रहा अब चल रहा हूं अब मै पहले से बेहतर चलूंगा।

लौटने और बृहत्तर लौटने का मानक क्या है.? अगर कुछ है भी ,तो किसने तय किया ? दो चार लोगों का तय किया मानक सारी दुनिया के लोगों के बृहत्तर लौटने का पैमाना कैसे हो सकता है..? सच कहूं तो मुझे ये लौटने का विचार ही समझ नहीं आता है। एक बार जन्म ले लेने के बाद और मरने से पहले लौटना कैसे हो सकता है ? लौटना संभव ही नहीं। पैदा हो जाने के बाद हम लौटकर फिर मां के पेट में नहीं जा सकते और न ज़िंदगी जी कर मौत पा लेने के बाद शमशान घाट जाते हुए रास्ते से लौटकर जी लिए गए पलों को सुधार ही सकते हैं।तुम ही बताओ..? सुधारा जा सकता है..? किसी को देखा है कुछ लौट कर सुधारा हो किसी ने ...? 

कुंवर नारायण जी होते तो मै उनसे इस बात पर असहमति जताता और कहता,आपने तो नचिकेता के मुख से कहलवाया की — " कहां जाऊं? हर दिशा में / मृत्यु से भी बहुत आगे की अपरिमित दूरियां हैं।" फिर आगे अपनी ही बात कैसे काट दिया। कैसे कह दिया — "अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा " जीवन लौटने का विकल्प का कब देता है? किस उम्र में देता है ? आप जानते हो तो लौट आइए और बताइए,मै उस उम्र तक झटपट दौड़कर पहुंचूंगा। और कहूंगा जीवन से ,मुझे लौटा दो, मां के गर्भ में भूर्ण रूप में नहीं,पिता के देह में वीर्य रूप में, मै अबकी लडूंगा ही नहीं लड़ाई जीवन पाने को,जीवन पा लेना जीवन में निस्सरता भर देता है। 

जीवन इतना अजीब क्यूं है? जीवन अपने साथ कुछ और विकल्प जोड़ लेता तो क्या उसकी उम्र घट जाती। जीवन में बहुत विकल्प है लौटने का विकल्प नहीं। जीवन एकबार को शुरू हो जाए तो जीना ही एक मात्र विकल्प है। ठहर ठहर के चला जा सकता है रफ़्तार धीमी और तेज़ की जा सकती है बस लौटने का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए मै कहूंगा.. "अबकी बार चला तो बृहत्तर चलूंगा " 

सजगता से चलने से अच्छा कुछ नहीं। चलने में ढेरों विकल्प है, जब मन हो ठहर लिया, जब मन हो मुड़ लिया,जब मन हो फिर चल पड़े...और मनुष्यों के लिए मुड़ना बहुत जरूरी है, उसके बिना उनका जीवन बेकार है। 

सबका तो पता नहीं, मुझे तो चहिए.. मै हर उस रास्ते से मुड़ जाना चाहता हूं जिसकी कोई मंज़िल हो, मंज़िल बोझिल होती है, रोमांच बस रास्ते में है। पेट भर जाने में वो आनंद नहीं जो पेट खाली रहने में है। होठ चबा के खून लाने में है। प्रेम पाने को तड़पने में है.. छू लेते ही प्रेम कम हो जाता है। सामान्य हो जाता है। मुझे अवसर मिला तो मै पूरा का पूरा पहाड़ पूजूंगा, उससे तोड़ कर बनाई गई निर्जीव मूर्ति को नहीं।

ऐसा मै अनुभव से कह रहा, पच्चीस की उम्र में पचासों प्रस्ताव आए जिसे मैंने मना कर दिया, मैने भी कुछ प्रस्ताव दिए, तीन तो मुझे बहुत अच्छे से याद है दो में सफ़ल रहा । फिर वहां से भी भागा, कहीं से मै भागा कहीं से मुझे भागने को मजबूर किया गया । अब मै सचमुच वहां ठहरा हूं जो मुझे ठहरने ही नहीं देना चाहता,जो मुझे बिलकुल वैसे चाहता है जैसे मै खुद को चाहता हूं। मै सचमुच कैसा हूं मुझे नहीं पता। मै सचमुच में हूं भी ये भी नहीं पता। पता होता तो होता क्यूं...

इतने वर्षों से भागते हुए जीवन में अब मै ठहराना चाहता हूं।आगे के रास्ते पर ध्यान से चलने के लिए उसका पतला सा मुलायम सा हाथ थामहे हुए,
उसका जिसे छूने को ,देखने को तरसता हूं.. कौन? वही जिसका कोई नाम नहीं है,कोई देह नहीं है। फिर छुने को कैसे तरसता हूं ? क्यूंकि छुने को देह नहीं पाता न..पा गया होता तो तरसता क्यूं...पर एक बात तय है अब मै सही रास्ते पर हूं..क्युकी अब मै तरस रहा.. 

एक बात कहता हूं सुनो जिस रास्ते में टीस न हो उस पर तिस भर न बढ़ना..रुकना, सोचना, चलना न, चले तो एक दिन लौटना चाहोगे..और यह जान लो, लौट नही पाओगे, क्यूंकि लौटना विकल्प ही नहीं है । प्रवचन जैसी बात कर रहा हूं न ...? मै ऐसी ही बात करता हूं जब करता हूं तो ! मुझे समझाना और रोना ही आता है,समझना नही! क्यूंकि मुझे लगता है समझ गया तो राह छूट जायेगी नासमझी की..फिर जीवन की राह बोझिल हो जायेगी.. नौकरी करनी पड़ेगी, परिवार चलाना पड़ेगा.. मुझमें इसकी इच्छा है पर डर भी है। ख़ुद को रोज़ आईने में देखना पड़ेगा, और खुद को रोज़ देखने से ज्यादा कष्टकारी क्या होगा भला..? मज़ाक नहीं कर बन्धु, देखो ख़ुद को रोज़, फिर महसूस करो, लौटना और ठहरना तक भूल जाओगे,अवसाद में रहोगे कवियों की तरह।

हर वो आदमी जो ख़ुद से मिलेगा अवसाद में रहेगा। क्यूंकि वो लौटना चाहेगा और लौटना संभव नहीं... बस चलना संभव है, इसलिए सर सीधा करो और चलो सरपट चलो.. जल्दी जल्दी चलो मौत के दरवाजे तक पहुंचो जिससे लौटने का सोचना ही न पड़े... मै चल रहा.. चलते हुए जीवन के इस सिरे पर हूं...तुम कहां हो... पीछे न देखो..मेरी आंख में देखो बताओ.. कहां हो..?

— आशुतोष प्रसिद्ध

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