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भाई के नाम ख़त

प्रिय आदित्य 

कल रात बहुत आँधी आई थी, कल भी 20 मई ही था मैं बेचैनी से भर गया था रात भर सो नहीं पाया, सुबह होने लगी तो भाग आया नदी पर घाट का नाम ठीक ठीक याद नहीं पर अकेले ही था मैं नदी के किनारे पर आसपास नहाने वाले लोगों की भीड़ थी सुबह के 5 बजे थे। गलत बीज मंत्र पढ़ते पंडित जी से लड़ झगड़ उन्ही की लगाई थाती पर बैठा था सर में सफेद गमछा बांधे, मैं किसी ख़्याल में गुम था अचानक किसी स्त्री ने अपने बेटे को पुकारा "ये आदित्य और अंदर मत जाना " 'आदित्य' ये नाम सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए, मैं पीछे मुड़ के देर तक देखता रहा आदित्य को कम पानी में नहाते। 

इस दुनिया में कितने ऐसे शब्द हैं जिनकी ध्वनि मात्र से दिल तरंगित हो उठता है। लगता है जैसे कोई यादों से भरी गाड़ी तेज से गुजरी, और हम उसके तेज हवा से हिल उठते हैं। मैं अब जब तुम्हें याद करता हूँ तो मेरे ज़हन में एक ही तस्वीर उभरती है वो उस दिन वाली,
जिस दिन बाबा गया दर्शन करने जा रहे थे। उस दिन तुम्हारी आँख पर किसी मधुमक्खी ने काट लिया था आँख सूज आई थी तुम्हारी,पर जब फोटू खिंचवाने की बारी आयी तो हम तुम खड़े हुए साथ,हमने तुम्हें अपना काला चश्मा दे दिया था कि तुम्हारी आँख न दिखे और फ़ोटो ली गयी थी,

आज 15 वर्ष बीत गए तुम्हें गए,पर तुम्हारे नाम की ध्वनि से मुझे आज भी उतना ही प्रेम है अब शायद और ज्यादा है। जब थे तो कीमत नहीं पता थी,जब पता चली तो हो नहीं। आज होते तो मेरे बराबर होते, नहीं थोड़ा मुझसे मोटे तगड़े होते, मैं बचपन से दुबला पतला था तुम मजबूत, तभी तो जब खेत मे गन्ना लाने हम साथ जाते थे तो तुम कहते थे तुम गन्ना खींचो मैं इस पर लद जाता हूँ, टूट जाएगा,तुम्हें याद होगा न आदित्य, एक दिन पूरे दोपहर हम दोनों मिलकर हैंडपंप में कंकड़ भर दिए थे, और उस दिन बाबा बहुत चिल्लाए थे। तुम्हें याद करते हुए मुझे बहुत ज्यादा कुछ याद नहीं आता..याद आता है तो वो दिन जब एक साँप मेरा पैर छू के गुज़र गया था और तुम गंडासा लेकर उसे दौड़ा लिए, केवल इसलिए कि मैं रो पड़ा था, तुम मुझे कुछ महीने कुछ दिन बड़े थे, अच्छा तुम्हें याद है वो रामअधार काका,जो हमें राम लक्ष्मण कहते थे, मैं अब जब जब उनका चेहरा देखता हूँ मेरा चेहरा उतर जाता है। अब तो वह भी नहीं रहे..

मैं तुम्हें और जीना चाहता हूँ आदित्य, मेरा बस चलता तो छीन लाता तुम्हें उस कथित ईश्वर से और फिर से पढता उसी लवकुश बाल विद्या मंदिर में जहाँ हम पढ़ने नहीं मिट्टी खेलने गए थे, कहाँ कितना दिन जिया हमने साथ गिनती के सात या आठ साल, उसमें भी कुछ दिन साथ रहे होंगे, मैं ननिहाल रहता था तुम बाज़ार वाले घर पर, घर के हर एक सदस्य के साथ तुम्हारी अनगिनत यादे होंगी, सबका अपना अपना पक्ष होगा, पर मैं, मेरा कोई पक्ष नहीं, बस मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ। अब गन्ना मैं अकेले तोड़ लेता हूँ,
पर वो स्वाद नहीं आता, सच तो यह है कि बीते कई वर्षों से गन्ना नहीं खाया, हैंडपंप अब घर में कोई चलाता ही नहीं, बाबा भी नहीं रहे अब, उनको भी गए 15 वर्ष हो गए, तुम कभी मिले थे वहाँ बाबा से..?कभी मिले तो लिपट जाना जोर से वो बहुत प्यार करते थे दिखाते नहीं थे बस..

घर भी अब घर जैसा नहीं रहा मेरे भाई,सबका अपना अपना घर बन गया है, सब अलग अलग रहते हैं, गाँव में सब कहते हैं इनका परिवार आज भी एक है, अब किसी के घर जाता हूँ तो कहते हैं बैठो पानी पी लो,
चाय पी लो, रिश्ते दार की तरह पेश आते हैं, बड़े पाप बड़ी मम्मी की तरह नहीं, लौटते हुए पैसा देते हैं,
मैं उन घरों में बंधा सा महसूस करता हूँ बिना किसी के अनुमति के कहीं से कुछ नहीं खा सकता,अब सब में औपचारिकता आ गयी है। मैं अभी भी गाँव वाले घर रहता हूँ उसी मैदान पर शाम को बैठता हूं जहाँ हम तुम अपने बालों में मिट्टी भरते खेलते रहते थे दिन भर,अब घर घर नहीं रह गया यार आदित्य, तुम जहाँ हो वहीं रहो, तुम यहाँ आओगे तो सब तुम्हें भी भर देंगे, बस इतना याद रखना तुम्हारा छोटा भाई तुम्हें बहुत याद करता है कल शाम को जब तेज आँधी आई थी मैं डर गया था, मैं अब तेज हवा से डरता हूँ जबसे इस हवा ने मुझसे तुम्हें छीन लिया,पता है वो आम का पेड़ सूख कर गिर गया जिसकी डाल तुम्हारे सर पर गिरी थी।

अब तेज हवा चलती है तो मैं बाहर नहीं निकलता अंदर से ही बैठकर देखता रहता हूँ तेज तेज हिलती शाखों को,अकेले में रो लेता हूँ चुप भी हो लेता हूँ पर किसी से नहीं कहता कि तुम्हारी याद आ रही है,आज तुम होते तो मैं तुम्हें अपनी लिखी कविता सुनाता और तुमसे गणित के सवाल सीखता,तुम्हारी तो गणित बहुत अच्छी थी न,वहाँ भी पढ़ते हो..? पता है मुझे आज भी गणित नहीं आई,मैं अभी भी उतना ही भावुक हूँ,रो देता हूँ जरा जरा सी बात पर, अच्छा वहाँ से मैं दिखता हूँ.. ?तुम्हें याद आती है अपने इस पगले भाई की..?

जानते हो आदित्य इस बार बारिश होगी तो मैं छत पर आऊंगा, तुम मेरे ऊपर बरस जाना पानी बनकर मैं भर लूँगा तुम्हें अपने अंदर अपने रोम रोम में और फिर जन्म दूँगा अपना बेटा बनाकर।उस अनजिए जीवन को जीने का और कोई दूसरा मार्ग नहीं दिखता मुझे...

तुम्हारी याद में
तुम्हारा भाई 
आशुतोष प्रसिद्ध

टिप्पणियाँ

  1. भावुक कर दिया

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  2. प्रेम ही है जो कभी हमें किसी से दूर नही करता.. दूर होकर भी पास होते है हम।..जिस तरह आप ओर आपके भाई

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  3. दिल भर आया भइया😔🙏

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  4. बहुत खबूसूरत 👏👏
    एक भाई को खोने का क्या दर्द होता है ये मैं अच्छे से समझ सकता हूँ क्योंकि अभी हाल ही मे मैने अपने बड़े भाई को खो दिया हैं। आज भी जब उनकीयाद आती है तो आँखेनम हो जाती है।😢😢

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  5. बहुत ही भावुक था और मैं आपके दर्द को महसूस भी के सकता हूं 👏

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  6. भईया आशू नहीं रोक पाया

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