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जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कह देने भर के लिए न कहते हुए..

इन दिनों सब कुछ उन दिनों से बिल्कुल अलग है जिन दिनों हम इन दिनों के विषय में सोचते हुए कहते थे साधन जीवन आसान करेंगे। साधन ने जीवन मुश्किल किया, छिपने के और रास्ते दिए, चोरी के कई कई तरीके, मारने के अनगिन हथियार ऐसे हथियार जो पैने नहीं होते, जो काटते नहीं कुचलते हैं या पीस देते हैं। धोखे बाजी के विकल्प ही विकल्प हैं। इन दिनों कुछ भी गम्भीर नहीं, यह सबसे गम्भीर विषय है।  इन दिनों संवेदनशील शब्द सबसे अधिक असंवेदनशील लोग उपयोग करते हैं। इन दिनों भाषा फूल की पंखुड़ी की तरह नहीं भाले की नोक की तरह चूभते हैं। इन दिनों सबसे कु-कर्मी वही हैं जिन्होंने सुकर्म के पाठ लिखे।  इन्हीं दिनों मैं हर रोज सोचता हूँ शब्दों का साथ छोड़ दूं, और हर रोज कुछ ऐसा घटता है कि शब्द स्वतः झरने लगते हैं मुझसे जैसे जबरन झिंझोड़ने से गिरते हैं पेड़ से कचे पके सारे फल  मैं धीरे धीरे द्वंदों को सुलझा रहा हूँ और उन प्रश्नों के उत्तर की तरफ जा रहा हूँ जो मैं लगभग 20 दिनों से तलाश रहा था। सच बेहद सीधा होता है, चुप्पी या एक भी अतिरिक्त शब्द से सच झूठ हो जाता है। हमें सबसे नहीं बस उस एक व्यक्ति से सच क...

कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

दिन भर एक पिल्ला अपनी मौत के लिए कलझता रहा। हुंकार भरता, रोता, पेट से जाने क्या निकाल देना चाह रहा था कि पूरी ताकत से बाहर साँस फेंकता रहा। मैं जो पिछले कई दिन से अपना जीवन समाप्त कर लेने का सोचता रहा था कि मेरे भीतर यह बात और गहरी हो गई कि न मौत आसान है न जीवन.. एक तीन महीने का पिल्ला मौत माँगते हुए पूरा दिन दौड़ता रहा अनन्तः रात में उसकी साँस रुकी। पापा और मैंने उसे मिट्टी में दफ़न किया। नहा खा के बैठा था। फिर से नहाया। दीदी रोने लगीं उन्होंने इधर कई दिन से दूध पिला पिला के जिंदा रखा था उसे।  अपने को कुचलने की इच्छा होती है। काश! हम अपनी परछाई पर नहीं खुद पर खड़े हो सकते मैं अब धीरे धीरे कठोर होता जा रहा हूँ, बहुत असमान्य सी घटनाओं पर भी सामान्य सा महसूस होता है बीते दिनों जो जो घटा, कितनी मौतें, कितने बलात्कार, कितनी जातीय हिंसा, कितना धार्मिक उन्माद, यह सब न जाने कैसे असर करता है मन हमेशा एक सा हुआ रहता है। ख़ुशी में बहुत कसकर हँस नहीं पाता। बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनसे मैं निकल नहीं पा रहा हूँ, तमाम दोमुहें लोगों को देखता हूँ, भीतर अजीब सा कष्ट होता है फिर समझा लेता हूँ...

अन-कथ

रात नींद नहीं आई। बीता सब पढ़ता रहा। तस्वीरों और आवाज़ों में खोया रहा। एक आवाज़ मुझसे कहती रही 'छाया मत छूना मन' लेकिन मन छाया में ही घूमता रहा। इन दिनों धूप बहुत तेज है। मेरी त्वचा जल गयी है। खुद के कहे, लिखे शब्दों को पढ़ते हुए मैंने पाया कि मैं अब अपनी माँ का बेटा नहीं बचा हूँ। मैं अब उसकी औलाद हूँ। वो जिसने मुझे नया जन्म दिया।  मैं बचपन में जितना क्रोधी ज़िद्दी और अकड़ से भरा हुआ आदमी था अब उतना ही शांत और सामंजस्य वादी हो गया हूँ। मैं परिवार का आदमी हो गया हूँ। पिछले कई वर्ष से मैं अपने परिवार में साम्य बनाने का प्रयास करता रहा, वो सब किया जो शायद आगे 40 की उम्र के बाद करना पड़ता। लचक और समझ यूँ नहीं मिलती बोझ और जिम्मेदारी हमें वो सीखा बना देता है जो हमने बचपन में सोचा था कभी नहीं होंगे। देखे सपने और मिले आश्वासनों पर नए आश्वासन की चकती लगाता रहा। मेरी कथरी में अनगिनत छेद हो गए हैं। मैं उसपर सुंदर रंगीन चद्दर बिछाकर छिपाने में लगा हूँ। अपने लिखे को पलट पलटकर पढ़ा। कुछ योजना जो सालों पहले बनायी थी वो आज तक अपने किसी रूप में नहीं पहुँची। आज हम सब जिस दशा में हैं वहाँ तक...

कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

एक समय हम जिस स्वभाव के लिए सराहे जाते हैं एक समय के बाद वही स्वभाव काटने लगता है। औरों को जो लगता हो लगता ही होगा ख़ुद को भी आभास होने लगता है कि हम उन जगहों पर अनाधिकृत प्रवेश कर रहें हैं जहाँ सीमित रहना था, बस विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति के लिए भावनाएं असीमित हो, अपने को भूल जाने का बल अधिक हो, अपनी हर इच्छा से पहले उसकी इच्छा की परवाह हो , वहाँ सीमित कैसे रहा जाए, कैसे खुद को सिकोड़ लिया जाए कि किसी को हमारे होने भर की भनक न लगे, कहते हैं आदमी जब दफनाया जाता 6 फिट जमीन लेता है, मैं जीते जी उतने में ही कैद हूँ। अपनी ही भावनाओं पर शर्मिंदा होता हूं, उस भावना पर जिसपर ख़ुश होना चाहिए था, खुला हुआ और जोते खेत की भूर-भूरी मिट्टी का रास्ता बनने की चाह और प्रयास में कब मैं कँटीला बाड़ा बनता चला गया, मुझे समझ ही नहीं आया।  जैसे जैसे मैं दुनिया को देख रहा हूँ, जान रहा हूँ, मुझे यह समझ आ रहा है कि जानना खोने का पहला चरण है। हर आदमी के भीतर वह आदमी है जो उस आदमी के अंदर नहीं होना चाहिए। यह जानते हुए भी कि क्या हमारे लिए ठीक नहीं है आदमी कर रहा है क्योंकि इसमें उसे किक मिल रही है,...

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हैं हम

भीतर अजीब सी उथलपुथल है। मन एक पल को सामान्य नहीं है। कल एक परीक्षा थी। उसके एक दिन पहले से ही मन जैसे बस बैठा जा रहा है। कहने को इतना कुछ है मगर उन्हें कह देना ठीक नहीं है। कल रात मैं देर तक सोच रहा था कि आख़िरी बार कब किसने मुझसे मेरी मर्जी पूछी, शायद किसी ने नहीं, हम योजना में होते होते कब बाहर हो जाता हूँ मुझे खुद पता नहीं चलता। खैर !.. छोड़ देते हैं जैसे सबके बीच मैं छूट जाता हूँ। सुबह बहुत जल्दी उठ गया था कहूँ या कहूँ रातभर नींद ही नहीं आई। सेंटर बगल ही था तो थोड़ा आराम से निकला, बाइक आधे रास्ते में बन्द हो गई, मैं लगातार प्रयास करता रहा मगर स्टार्ट न हुई, न जाने क्यूँ पहले कभी ऐसा होता नहीं था.. थोड़ी दूर पैदल लेकर चला, पैर की चोट से चला नहीं जा रहा था, खून आने लगा तो पसीने से लथपथ हुए वहीं रुक गया, बगल एक दुकान दिखी मगर सुबह 8 बजे कौन मोटरसाइकिल बनाता है, मैं निरीह सा खड़ा रहा, बगल एक बुजुर्ग ने पान की दुकान खोली थी, मुझसे पूछे क्या हुआ बच्चा ? मैं बोला, गाड़ी बन्द हो गई है बाबा चल नहीं रही है परीक्षा देने जाना था, तो बोले चाभी मुझे दे दो, चले जाओ , मैं मिस्त्री क...