इन दिनों सब कुछ उन दिनों से बिल्कुल अलग है जिन दिनों हम इन दिनों के विषय में सोचते हुए कहते थे साधन जीवन आसान करेंगे। साधन ने जीवन मुश्किल किया, छिपने के और रास्ते दिए, चोरी के कई कई तरीके, मारने के अनगिन हथियार ऐसे हथियार जो पैने नहीं होते, जो काटते नहीं कुचलते हैं या पीस देते हैं। धोखे बाजी के विकल्प ही विकल्प हैं। इन दिनों कुछ भी गम्भीर नहीं, यह सबसे गम्भीर विषय है। इन दिनों संवेदनशील शब्द सबसे अधिक असंवेदनशील लोग उपयोग करते हैं। इन दिनों भाषा फूल की पंखुड़ी की तरह नहीं भाले की नोक की तरह चूभते हैं। इन दिनों सबसे कु-कर्मी वही हैं जिन्होंने सुकर्म के पाठ लिखे। इन्हीं दिनों मैं हर रोज सोचता हूँ शब्दों का साथ छोड़ दूं, और हर रोज कुछ ऐसा घटता है कि शब्द स्वतः झरने लगते हैं मुझसे जैसे जबरन झिंझोड़ने से गिरते हैं पेड़ से कचे पके सारे फल मैं धीरे धीरे द्वंदों को सुलझा रहा हूँ और उन प्रश्नों के उत्तर की तरफ जा रहा हूँ जो मैं लगभग 20 दिनों से तलाश रहा था। सच बेहद सीधा होता है, चुप्पी या एक भी अतिरिक्त शब्द से सच झूठ हो जाता है। हमें सबसे नहीं बस उस एक व्यक्ति से सच क...