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भाई के नाम ख़त

प्रिय आदित्य  कल रात बहुत आँधी आई थी, कल भी 20 मई ही था मैं बेचैनी से भर गया था रात भर सो नहीं पाया, सुबह होने लगी तो भाग आया नदी पर घाट का नाम ठीक ठीक याद नहीं पर अकेले ही था मैं नदी के किनारे पर आसपास नहाने वाले लोगों की भीड़ थी सुबह के 5 बजे थे। गलत बीज मंत्र पढ़ते पंडित जी से लड़ झगड़ उन्ही की लगाई थाती पर बैठा था सर में सफेद गमछा बांधे, मैं किसी ख़्याल में गुम था अचानक किसी स्त्री ने अपने बेटे को पुकारा "ये आदित्य और अंदर मत जाना " 'आदित्य' ये नाम सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए, मैं पीछे मुड़ के देर तक देखता रहा आदित्य को कम पानी में नहाते।  इस दुनिया में कितने ऐसे शब्द हैं जिनकी ध्वनि मात्र से दिल तरंगित हो उठता है। लगता है जैसे कोई यादों से भरी गाड़ी तेज से गुजरी, और हम उसके तेज हवा से हिल उठते हैं। मैं अब जब तुम्हें याद करता हूँ तो मेरे ज़हन में एक ही तस्वीर उभरती है वो उस दिन वाली, जिस दिन बाबा गया दर्शन करने जा रहे थे। उस दिन तुम्हारी आँख पर किसी मधुमक्खी ने काट लिया था आँख सूज आई थी तुम्हारी,पर जब फोटू खिंचवाने की बारी आयी तो हम तुम खड़े हुए साथ,हमने तुम्हें अपना का...